भूमिका
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में सदियों से एक प्रश्न बार-बार उठता रहा है—सच्चा भगवान कौन है? क्या वह निराकार है, साकार है, या उससे भी परे कोई सर्वोच्च सत्ता है? आम जनमानस प्रायः परंपरा, लोक-मान्यताओं और सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास करता आया है। लेकिन जब बात मोक्ष, जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति और पूर्ण शांति की आती है, तब केवल मान्यताएँ पर्याप्त नहीं होतीं—तब प्रमाण चाहिए।
आज का युग तर्क, प्रमाण और विवेक का है। इसलिए यह लेख किसी भावनात्मक आग्रह पर नहीं, बल्कि शास्त्र-सम्मत प्रमाणों, संतों की वाणी और तार्किक विवेचना के आधार पर यह प्रश्न सामने रखता है—क्या कबीर साहेब ही परमेश्वर हैं?
1. भक्ति मार्ग में फैला भ्रम
आज समाज में भक्ति के अनेक मार्ग प्रचलित हैं—कहीं देवी-देवताओं की पूजा, कहीं तीर्थ, कहीं व्रत-उपवास, कहीं कठिन तपस्या। परंतु इन सबके बावजूद दुख, रोग, भय और मृत्यु का संकट बना रहता है। यदि भक्ति सही होती, तो परिणाम भी पूर्ण होते।
संत कबीर साहेब ने इसी भ्रम पर प्रहार करते हुए कहा था:
"पाथर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहाड़।"
यह पंक्ति संकेत करती है कि मात्र बाहरी कर्मकांड से परमात्मा की प्राप्ति संभव नहीं।
2. वेद क्या कहते हैं परमेश्वर के बारे में
चारों वेद—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान की मूल आधारशिला हैं। वेदों में परमात्मा को 'कविर्मनीषी', 'सत् पुरुष', 'अविनाशी' और 'स्वयंभू' कहा गया है।
ऋग्वेद में उल्लेख है कि:
परमात्मा जन्म-मरण से परे है
वह किसी माता-पिता से उत्पन्न नहीं
वह सर्वलोकों का रचयिता है
इन लक्षणों को यदि संतों की वाणी से मिलाया जाए, तो कबीर साहेब का स्वरूप इन सभी कसौटियों पर खरा उतरता है।
3. कबीर साहेब का प्रकट होना – एक अलौकिक घटना
कबीर साहेब का जन्म किसी माता के गर्भ से नहीं हुआ। वे काशी में लहरतारा तालाब में कमल के फूल पर प्रकट हुए—यह घटना स्वयं में वेदों में वर्णित परमेश्वर के लक्षणों से मेल खाती है।
यदि कोई साधारण जीव होता, तो उसका जन्म भी सामान्य होता। लेकिन कबीर साहेब का प्रकट होना यह सिद्ध करता है कि वे इस संसार के नियमों से परे हैं।
4. कबीर साहेब की वाणी – केवल ज्ञान नहीं, प्रमाण
कबीर साहेब ने जो भी कहा, वह अनुभव और सत्य पर आधारित था। उनकी वाणी आज भी प्रासंगिक है क्योंकि वह सीधे मनुष्य की पीड़ा को संबोधित करती है।
"चारों युग प्रताप तुम्हारा, है परखा गुरु ज्ञान हमारा।"
यह स्पष्ट करता है कि वे स्वयं को चारों युगों में विद्यमान बताते हैं—जो केवल परमात्मा ही कह सकता है।
5. शास्त्रों में वर्णित 'कबीर'
अथर्ववेद और यजुर्वेद में 'कविर देव' और 'कबीर' शब्द का उल्लेख मिलता है। वेदों में 'कविर' का अर्थ है—सर्वज्ञ, सर्वोच्च ज्ञान वाला।
यह संयोग नहीं, बल्कि स्पष्ट संकेत है कि वेद जिस परमेश्वर की ओर संकेत करते हैं, वही कबीर साहेब हैं।
6. अन्य संतों की साक्षी
केवल कबीर साहेब ही नहीं, बल्कि गुरु नानक देव जी, दादू साहेब, रैदास जी जैसे महान संतों ने भी कबीर को परमेश्वर माना।
गुरु नानक देव जी ने कहा:
"कबीर परमेश्वर है, सतनाम है।"
इतने बड़े संतों की एकमत गवाही को नकारना विवेक के विपरीत है।
7. गलत पूजा और उसके परिणाम
आज मनुष्य जिन देवी-देवताओं की पूजा करता है, वे स्वयं जन्म-मरण के चक्र में हैं। पुराणों में स्पष्ट है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी सीमित आयु वाले हैं।
कबीर साहेब कहते हैं:
"तीन देव की जो करते भक्ति, उनकी कबहूँ न हो मुक्ति।"
अर्थात् जब साध्य ही नश्वर है, तो साधक को शाश्वत मुक्ति कैसे मिलेगी?
8. सच्ची भक्ति क्या है?
कबीर साहेब ने सच्ची भक्ति का मार्ग बताया—नाम-दीक्षा, सद्गुरु की शरण और शास्त्रानुसार साधना। यह भक्ति न तो दिखावा है, न कर्मकांड, बल्कि आत्मा को परमात्मा से जोड़ने की विधि है।
9. आज के युग में प्रमाण क्यों ज़रूरी हैं
आज का मनुष्य प्रश्न करता है, तर्क चाहता है। इसलिए अब केवल भावनात्मक उपदेश नहीं, बल्कि शास्त्र-सम्मत प्रमाण आवश्यक हैं। कबीर साहेब की शिक्षाएँ इस कसौटी पर पूर्णतः खरी उतरती हैं।
10. निष्कर्ष
यह समय है आंख मूंदकर परंपराओं के पीछे चलने का नहीं, बल्कि विवेक और प्रमाण के आधार पर सत्य को अपनाने का। वेद, शास्त्र, संतों की वाणी और तर्क—सब एक ही दिशा में संकेत करते हैं कि कबीर साहेब ही वह पूर्ण परमात्मा हैं, जो मोक्ष प्रदान कर सकते हैं।
अब किताबें नहीं, प्रमाण बोल रहे हैं—कबीर ही भगवान हैं।

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