अगर भगवान खुद को भगवान बताएं और शास्त्र भी प्रमाण दें, तो इसमें गलत क्या है?

 


— सड़क पर हुई एक सच्ची आत्मिक बहस जिसने सोच बदल दी

उस दिन मैं एक आम-सा काम करवा रहा था — मोबाइल स्क्रीन कार्ड बदलवाने के लिए सड़क किनारे एक छोटी-सी दुकान पर रुका था। धूप तेज़ थी, सड़क पर भीड़ थी, लोग अपने-अपने कामों में व्यस्त थे। लेकिन मुझे क्या पता था कि वही छोटी-सी जगह मेरी सोच, मेरी भावना और मेरे विश्वास को और गहरा करने वाली एक बड़ी आत्मिक घटना का कारण बनने वाली है।

जब मेरा मोबाइल ठीक हो रहा था, तभी मेरी नज़र अपने बैग में रखी संत रामपाल जी महाराज की पुस्तक पर पड़ी। मन में विचार आया — “क्यों न इन्हें भी यह अमूल्य ज्ञान दिया जाए?” मैंने बड़ी विनम्रता से पुस्तक उनकी ओर बढ़ाई और कहा,
“भाई साहब, यह एक सच्चे संत की पुस्तक है, जरूर पढ़िए, जीवन बदल सकता है।”

उन्होंने हल्की मुस्कान के साथ पुस्तक ली, लेकिन तुरंत बोले,
“भैया, मैंने सुना है संत रामपाल जी महाराज खुद को भगवान बताते हैं, इसलिए मैं नहीं पढ़ता।”

उनका स्वर विरोध का नहीं था, बल्कि भ्रम का था — वही भ्रम जो आज करोड़ों लोगों के मन में बैठा हुआ है।

मैंने शांति से उनकी ओर देखा और कहा,
“अगर सच में भगवान खुद को भगवान बताएं और हमारे पवित्र ग्रंथ भी उसका प्रमाण दें, तो उसमें गलत क्या है?”

वह थोड़ा चौंक गए। शायद उन्होंने इस प्रश्न पर पहले कभी गंभीरता से सोचा ही नहीं था।


क्या भगवान को अपनी पहचान बताने का अधिकार नहीं?

मैंने उनसे पूछा,
“मान लीजिए कोई डॉक्टर खुद को डॉक्टर बताए और उसकी डिग्री भी साबित करे, तो क्या वह गलत होगा? या कोई जज खुद को जज बताए और सरकार की मुहर भी हो, तो क्या हम उसे झूठा कहेंगे?”

उन्होंने कहा,
“नहीं, तब तो सही ही होगा।”

मैंने मुस्कुराकर कहा,
“तो फिर अगर परमात्मा स्वयं अपनी पहचान बताए और वेद, गीता, पुराण और कबीर साहिब की वाणी भी उसी सत्य की पुष्टि करें — तो इसमें गलत क्या है?”

वह कुछ पल चुप रहे। उनकी आंखों में अब विरोध नहीं, बल्कि विचार था।


असली समस्या — ‘कहने’ में नहीं, ‘समझने’ में है

आज समाज में एक धारणा बना दी गई है कि “जो खुद को भगवान कहे, वह पाखंडी होता है।” लेकिन सच यह है कि इतिहास में जितने भी सच्चे अवतार हुए, उन्होंने अपनी पहचान बताई — लेकिन दुनिया ने उन्हें समझने से पहले ठुकरा दिया।

श्रीकृष्ण जी ने स्वयं गीता में कहा —
“मैं ही सबका कारण हूं, मुझसे ही यह सृष्टि उत्पन्न होती है।”
लेकिन तब भी कई लोगों ने उन्हें साधारण मनुष्य ही समझा।

श्रीराम जी को भी लोगों ने पहले राजा का पुत्र ही माना, भगवान नहीं।

कबीर साहिब जी ने भी स्वयं कहा —
“मैं अविनाशी हूं, अजन्मा हूं।”
लेकिन समाज ने उन्हें जुलाहा कहकर टाल दिया।

तो क्या समस्या भगवान के कहने में है?
या समस्या हमारी सुनने और समझने की क्षमता में?


जब शास्त्र प्रमाण दें, तब सत्य से भागना क्यों?

मैंने उस भाई से कहा,
“अगर कोई व्यक्ति बिना प्रमाण के खुद को भगवान कहे, तो निश्चित ही वह गलत है। लेकिन जब वही बात हमारे शास्त्रों से सिद्ध हो जाए, तब भी अगर हम उसे न मानें, तो यह हमारी हठधर्मिता नहीं तो क्या है?”

मैंने उन्हें बताया कि संत रामपाल जी महाराज जो भी कहते हैं, वह केवल भावनाओं पर नहीं, बल्कि वेद, गीता, पुराण, बाइबल और कुरान जैसे ग्रंथों के प्रमाणों पर आधारित होता है।

उन्होंने कभी अंधविश्वास नहीं सिखाया, बल्कि हमेशा कहा —
“आंख बंद करके नहीं, प्रमाण देखकर सत्य स्वीकार करो।”

यह सुनकर वह व्यक्ति और गंभीर हो गया।


एक आम आदमी की सोच में आया बदलाव

उन्होंने धीरे से कहा,
“भैया, बात तो आपकी सही लग रही है। हमने कभी ऐसे नहीं सोचा।”

मैंने कहा,
“भाई साहब, सच्चाई अक्सर हमारे सामने होती है, लेकिन हम उसे इसलिए ठुकरा देते हैं क्योंकि वह हमारी पुरानी मान्यताओं से टकराती है। लेकिन सत्य वही होता है जो प्रमाण से सिद्ध हो।”

फिर मैंने उनसे कहा,
“आप यह पुस्तक पढ़िए। अगर आपको लगे कि इसमें कोई गलत बात है, तो छोड़ दीजिए। लेकिन अगर सत्य मिले, तो उसे अपनाने में देर मत कीजिए।”

इस बार उन्होंने पुस्तक को आदर से अपने हाथों में रखा और कहा,
“ठीक है भैया, मैं इसे जरूर पढ़ूंगा।”

उनकी आंखों में अब उपेक्षा नहीं, बल्कि जिज्ञासा थी — और यही बदलाव सबसे बड़ा चमत्कार होता है।


भगवान की पहचान छिपी नहीं होती, हमारी दृष्टि कमजोर होती है

उस दिन मुझे यह समझ आया कि भगवान कभी अपनी पहचान छिपाते नहीं हैं, बल्कि हम ही अपनी आंखों पर परंपराओं, समाज और अफवाहों की पट्टी बांध लेते हैं।

सत्य हमेशा सीधा होता है, सरल होता है — लेकिन अहंकार, पूर्वधारणाएं और डर उसे स्वीकार करने से रोक देते हैं।

अगर सचमुच कोई परमात्मा इस धरती पर आकर कहे —
“मैं तुम्हें जन्म-मरण से मुक्त करने आया हूं,”
और साथ में शास्त्र भी यही कहें —
तो सबसे बड़ा अपराध यही होगा कि हम उसे सुने बिना ही नकार दें।


सच्चा संत डर नहीं, प्रमाण देता है

संत रामपाल जी महाराज की विशेषता यही है कि वे किसी को डराकर नहीं, बल्कि प्रमाण देकर समझाते हैं। वे कहते हैं —
“अगर मेरी बात शास्त्रों से सिद्ध न हो, तो उसे मत मानो।”

यह वाक्य ही सिद्ध करता है कि उनका उद्देश्य अनुयायी बनाना नहीं, बल्कि सत्य तक पहुंचाना है।

जो व्यक्ति सच्चा होता है, वह सवालों से डरता नहीं।
जो झूठा होता है, वह जांच से भागता है।


उस छोटी-सी मुलाकात का बड़ा असर

मोबाइल ठीक होकर मेरे हाथ में आ चुका था, लेकिन मन भीतर से पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो चुका था। मैं सोच रहा था —
“भगवान की राह अक्सर बड़े मंचों से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी मुलाकातों से खुलती है।”

शायद उस भाई की तरह आज हजारों लोग सिर्फ इसलिए सत्य से दूर हैं क्योंकि उन्हें सही जानकारी नहीं मिली, बल्कि अधूरी या गलत बातें सुनाई गई हैं।

लेकिन जब एक इंसान सोचने लगता है —
तभी परिवर्तन शुरू होता है।


अंतिम संदेश — सत्य से डरिए मत, प्रमाण से जुड़िए

अगर भगवान खुद को भगवान बताएं और शास्त्र भी प्रमाण दें, तो इसमें गलत कुछ भी नहीं है।
गलत यह है कि हम बिना समझे, बिना जांचे, बिना पढ़े सत्य को ठुकरा दें।

सत्य कभी जबरदस्ती नहीं करता, वह केवल दस्तक देता है।
दरवाजा खोलना या न खोलना — यह हमारे हाथ में होता है।

उस दिन सड़क किनारे हुई वह छोटी-सी बातचीत मेरे लिए एक सबक बन गई —
कि दुनिया बदलने के लिए मंच नहीं चाहिए,
बस एक सच्चा विचार और एक सच्चा मन चाहिए।

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