मेरा नाम तरुण दास है। यह कहानी किसी कल्पना, अफवाह या प्रचार का हिस्सा नहीं है, बल्कि मेरे जीवन की वह सच्चाई है जिसे मैं आज भी याद करता हूँ तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। वह समय मेरी ज़िंदगी का सबसे डरावना दौर था — जब मौत मेरी आँखों के सामने खड़ी थी और जीवन की सारी उम्मीदें धीरे-धीरे टूटती जा रही थीं। लेकिन उसी अंधेरे समय में एक ऐसा उजाला मिला जिसने न सिर्फ मेरी जान बचाई, बल्कि मुझे जीने का नया उद्देश्य भी दिया। वह उजाला था — संत रामपाल जी महाराज जी की कृपा।
अचानक आई ज़िंदगी की सबसे बड़ी परीक्षा
सब कुछ सामान्य चल रहा था। मैं अपने काम, परिवार और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में व्यस्त था। लेकिन अचानक मेरी तबीयत बिगड़ने लगी। पहले हल्का बुखार, फिर तेज़ कमजोरी और धीरे-धीरे हालत इतनी गंभीर हो गई कि उठना-बैठना भी मुश्किल हो गया। परिवार वाले घबरा गए। मुझे कई अस्पतालों में दिखाया गया, तरह-तरह की जाँच हुईं, रिपोर्ट बद से बदतर आती गईं।
डॉक्टरों की बातें सुनकर मन और टूटने लगा। कोई साफ़ जवाब नहीं दे पा रहा था कि बीमारी क्या है, और जो इलाज चल रहा था उसका भी कोई असर नहीं दिख रहा था। शरीर कमजोर होता जा रहा था और मन में डर बैठ गया था — क्या अब मैं बच पाऊँगा?
जब डॉक्टरों की उम्मीदें भी कम होने लगीं
एक दिन डॉक्टर ने परिवार वालों से अलग ले जाकर बात की। मैं कमरे में लेटा सब कुछ सुन नहीं पा रहा था, लेकिन उनके चेहरों पर जो तनाव था, वह बहुत कुछ कह रहा था। बाद में मुझे पता चला कि डॉक्टरों ने साफ शब्दों में कहा था कि हालत गंभीर है और आगे कुछ भी कहा नहीं जा सकता।
उस पल मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मौत कोई दूर की चीज़ नहीं, बल्कि बिल्कुल पास खड़ी सच्चाई हो सकती है। मन में डर था, बेचैनी थी, लेकिन उससे ज़्यादा अपने परिवार की चिंता थी। मैं सोच रहा था — अगर मुझे कुछ हो गया तो मेरे अपनों का क्या होगा?
निराशा के अंधेरे में एक उम्मीद की किरण
इसी बीच हमारे परिवार के एक परिचित ने संत रामपाल जी महाराज जी के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि वे सच्चे संत हैं, जिनकी भक्ति से लोगों के जीवन में असंभव लगने वाले परिवर्तन आए हैं। पहले तो मुझे विश्वास नहीं हुआ। उस हालत में जब शरीर टूट चुका हो, दिमाग भी हर बात पर शक करता है। लेकिन जब हर रास्ता बंद नजर आने लगे, तब इंसान आख़िरी उम्मीद भी पकड़ लेता है।
मेरे परिवार ने संत रामपाल जी महाराज जी के बताए मार्ग पर चलने का निर्णय लिया। उन्होंने मुझे उनके नाम का स्मरण करने को कहा, मन से प्रार्थना करने को कहा और सच्चे मन से ईश्वर से जुड़ने की प्रेरणा दी।
भीतर से बदलने लगी मेरी स्थिति
मैंने कुछ नहीं खोया था, इसलिए पूरी श्रद्धा से मन ही मन प्रार्थना करने लगा। मैं यह नहीं कहूँगा कि उसी पल चमत्कार हो गया, लेकिन धीरे-धीरे मेरे भीतर एक अजीब-सी शांति आने लगी। वह डर, जो हर समय मन में छाया रहता था, थोड़ा-थोड़ा कम होने लगा। मन को एक सहारा मिल गया — जैसे कोई अदृश्य शक्ति मेरे साथ खड़ी हो।
कुछ ही दिनों में डॉक्टर भी हैरान होने लगे। जिन रिपोर्ट्स में कोई सुधार नहीं दिख रहा था, उनमें सकारात्मक बदलाव आने लगा। शरीर में ताकत लौटने लगी, भूख खुलने लगी और मैं धीरे-धीरे खुद से उठकर बैठने लगा।
डॉक्टरों के लिए भी बनी आश्चर्य की बात
डॉक्टर कहते थे, “हमने दवाइयाँ तो वही रखी हैं, लेकिन सुधार उम्मीद से कहीं ज़्यादा तेज़ है।” मेरे परिवार वाले एक-दूसरे को देखकर बस यही कहते — “यह संत रामपाल जी महाराज जी की कृपा है।”
मेरे लिए यह केवल शरीर का ठीक होना नहीं था, बल्कि मन और आत्मा का भी नया जन्म था। जो इंसान कुछ दिन पहले तक खुद को मौत के करीब महसूस कर रहा था, वही अब जीवन की छोटी-छोटी खुशियों को दोबारा महसूस करने लगा।
जब मैंने खुद से पूछा — क्या यह सिर्फ संयोग था?
कुछ लोग इसे संयोग कह सकते हैं, कुछ मेडिकल रिकवरी। लेकिन मैं खुद जानता हूँ कि मेरी हालत जिस स्तर तक गिर चुकी थी, वहाँ से वापसी इतनी सहज नहीं होती। अंदर से टूट चुका इंसान सिर्फ दवाइयों से ही नहीं, बल्कि मानसिक और आत्मिक सहारे से ही उठ खड़ा होता है।
मेरे लिए वह सहारा संत रामपाल जी महाराज जी थे। उनकी शिक्षा, उनका मार्गदर्शन और ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति का रास्ता — यही मेरी असली दवा बनी।
जीवन के प्रति बदली हुई सोच
इस अनुभव के बाद मेरी सोच पूरी तरह बदल गई। पहले मैं सिर्फ अपने काम, पैसे और दुनियावी बातों तक सीमित था। लेकिन मौत को इतनी नज़दीक से देखने के बाद समझ आया कि जीवन का असली उद्देश्य सिर्फ कमाना नहीं, बल्कि सही जीवन जीना है — सत्य, सेवा और सद्भाव के साथ।
मैंने संत रामपाल जी महाराज जी के सत्संगों को सुनना शुरू किया, उनके बताए मार्ग पर चलने की कोशिश की और अपने अंदर बदलाव महसूस किया। क्रोध कम हुआ, धैर्य बढ़ा और दूसरों के प्रति सहानुभूति पैदा हुई।
परिवार के लिए भी बना यह अनुभव वरदान
सिर्फ मेरी ज़िंदगी ही नहीं बदली, बल्कि मेरे पूरे परिवार की सोच भी बदल गई। जो लोग पहले सिर्फ इलाज तक सीमित थे, अब ईश्वर पर सच्चे मन से विश्वास करने लगे। घर का माहौल पहले से ज्यादा शांत, सकारात्मक और प्रेमपूर्ण हो गया।
मेरे माता-पिता कहते हैं कि उन्होंने मुझे दो बार जन्म लेते देखा — एक बार माँ के गर्भ से और दूसरी बार संत रामपाल जी महाराज जी की कृपा से।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो…
आज जब मैं पूरी तरह स्वस्थ हूँ, अपने पैरों पर खड़ा हूँ और सामान्य जीवन जी रहा हूँ, तो उस समय को याद करके आँखें भर आती हैं। अगर उस दिन संत रामपाल जी महाराज जी का मार्गदर्शन न मिला होता, अगर ईश्वर की शरण में जाने का अवसर न मिला होता, तो शायद आज मैं यह शब्द लिखने के लिए भी मौजूद न होता।
मैं यह दावा नहीं करता कि मेरी कहानी हर किसी की कहानी होगी, लेकिन यह जरूर कह सकता हूँ कि सच्ची भक्ति इंसान को अंदर से मजबूत बनाती है, उसे टूटने नहीं देती और अंधेरे में भी रोशनी दिखाती है।
मेरी सच्ची गवाही
मैं, तरुण दास, पूरे विश्वास और ईमानदारी से कहता हूँ कि मेरा जीवन बचना मेरे लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है। और उस चमत्कार के पीछे जो शक्ति मैं महसूस करता हूँ, वह है — संत रामपाल जी महाराज जी की कृपा।
यह लेख मैंने किसी प्रचार के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए लिखा है जो आज जीवन से हार मान चुके हैं, जो दर्द, बीमारी या निराशा से टूट चुके हैं। अगर मेरी कहानी किसी एक इंसान को भी उम्मीद दे सके, तो मेरा उद्देश्य पूरा हो जाएगा।
अंतिम शब्द
जब मौत सामने खड़ी होती है, तब इंसान को समझ आता है कि जीवन कितना अनमोल है। लेकिन जब उसी मौत के सामने से कोई आपको वापस लौटा लाए, तो वह सिर्फ जीवन नहीं देता — वह नई सोच, नई दिशा और नया उद्देश्य भी देता है।
मेरे लिए वह जीवनदाता हैं —
संत रामपाल जी महाराज जी।
🙏

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