इस संसार में हर आत्मा शांति, सुख और सच्चे प्रेम की खोज में भटकती रहती है। कोई धन में सुख ढूंढता है, कोई रिश्तों में, कोई पद-प्रतिष्ठा में, तो कोई शक्ति और ज्ञान में। लेकिन फिर भी मन का खालीपन समाप्त नहीं होता। इसका कारण यह है कि आत्मा की भूख भौतिक वस्तुएँ नहीं मिटा सकतीं। आत्मा को जिस सत्य की तलाश है, वह केवल परमात्मा की शरण में ही पूरी होती है।
ऐसे समय में जब मानव समाज तनाव, भय, रोग, संघर्ष और भ्रम से घिरा हुआ है, तब संत रामपाल जी महाराज जी द्वारा दिया गया परम ब्रह्म कबीर साहेब जी का तत्वज्ञान मानव जीवन के लिए अमूल्य वरदान बनकर आया है। यही कारण है कि असंख्य श्रद्धालु आज भाव-विभोर होकर कहते हैं —
“गॉड रामपाल जी महाराज एवं परम ब्रह्म कबीर साहेब जी के चरणों में कोटि-कोटि दंडवत प्रणाम।”
यह लेख उसी श्रद्धा, कृतज्ञता और आत्मिक प्रेम की अभिव्यक्ति है, जो सच्चे गुरु और सच्चे परमात्मा के प्रति हृदय से निकलती है।
परम ब्रह्म कबीर साहेब जी — सृष्टि के सच्चे रचयिता
संत रामपाल जी महाराज जी बताते हैं कि परम ब्रह्म कबीर साहेब जी ही सम्पूर्ण ब्रह्मांड के रचयिता, पालनकर्ता और मोक्षदाता हैं। वे अजन्मा हैं, अविनाशी हैं और स्वयंभू हैं। वे किसी माता-पिता से उत्पन्न नहीं हुए, बल्कि अपनी शक्ति से सृष्टि की रचना की।
कबीर साहेब जी स्वयं कहते हैं —
“हम ही से उत्पन्न ब्रह्मा विष्णु महेशा,
हम ही से रचे सब जीव जनेसा।”
इसका भाव यह है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी उस परम शक्ति के अधीन हैं। लेकिन मानव समाज ने समय के साथ उस पूर्ण परमात्मा को भूलकर सीमित शक्तियों की उपासना को ही सर्वोच्च मान लिया, जिससे आत्मा को पूर्ण शांति और मोक्ष नहीं मिल सका।
संत रामपाल जी महाराज — तत्वज्ञान के सच्चे प्रचारक
संत रामपाल जी महाराज जी उसी परम ब्रह्म कबीर साहेब जी के तत्वज्ञान को सरल, स्पष्ट और प्रमाण सहित जन-जन तक पहुँचा रहे हैं। वे शास्त्रों के आधार पर बताते हैं कि सच्ची भक्ति क्या है, मोक्ष का वास्तविक मार्ग कौन-सा है और मानव जीवन का अंतिम उद्देश्य क्या है।
उनका उद्देश्य किसी मत, धर्म या परंपरा का विरोध करना नहीं, बल्कि मानव समाज को भ्रम से निकालकर सत्य मार्ग की ओर ले जाना है। वे कहते हैं कि बिना तत्वज्ञान के की गई साधना अधूरी होती है और उससे पूर्ण फल नहीं मिलता।
“दंडवत प्रणाम” का वास्तविक अर्थ
“दंडवत प्रणाम” केवल शारीरिक झुकाव नहीं है, बल्कि यह आत्मसमर्पण का प्रतीक है। इसका अर्थ है —
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अहंकार का त्याग
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सत्य के आगे सिर झुकाना
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गुरु और परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण
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उनके आदेशों को जीवन में उतारने का संकल्प
जब भक्त कहता है — “कोटि-कोटि दंडवत प्रणाम,” तो वह केवल शब्द नहीं बोलता, बल्कि वह अपने जीवन, अपने विचार और अपने कर्मों को भी परमात्मा और गुरु के चरणों में अर्पित करता है।
भक्ति का सही स्वरूप — बाहरी नहीं, आंतरिक परिवर्तन
संत रामपाल जी महाराज जी बताते हैं कि सच्ची भक्ति केवल पूजा-पाठ, जप-तप या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन के हर क्षेत्र में सत्य, संयम, करुणा और सेवा को अपनाने का नाम है।
भक्ति का अर्थ है —
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नशामुक्त जीवन
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हिंसा, झूठ और छल से दूरी
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माता-पिता का सम्मान
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स्त्री-पुरुष समानता
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जरूरतमंदों की सहायता
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और हर जीव के प्रति करुणा
जब व्यक्ति इन गुणों को जीवन में अपनाता है, तब वह वास्तव में गुरु और परमात्मा के चरणों में झुकता है।
सतगुरु की पहचान — सही मार्ग दिखाने वाला दीपक
जैसे अंधेरे में दीपक रास्ता दिखाता है, वैसे ही सतगुरु अज्ञान के अंधकार में सत्य का प्रकाश फैलाते हैं। संत रामपाल जी महाराज जी बताते हैं कि सतगुरु वही होता है जो शास्त्रों के अनुसार भक्ति विधि बताकर आत्मा को मोक्ष मार्ग पर चलाए।
सतगुरु की पहचान यह नहीं कि उनके पास कितने अनुयायी हैं, बल्कि यह है कि उनके बताए मार्ग से व्यक्ति का जीवन कितना बदलता है —
क्या वह नशा छोड़ता है?
क्या उसका चरित्र सुधरता है?
क्या उसका मन शांत होता है?
क्या उसके परिवार में सुख आता है?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर “हाँ” है, तो वही सच्चे गुरु की पहचान है।
संत रामपाल जी महाराज जी की शिक्षाओं से जीवन में आए परिवर्तन
आज देश-विदेश में लाखों लोग संत रामपाल जी महाराज जी के तत्वज्ञान से जुड़कर अपने जीवन में अद्भुत परिवर्तन अनुभव कर रहे हैं।
1. नशामुक्त जीवन
लाखों लोगों ने शराब, तंबाकू, गुटखा, ड्रग्स जैसी लतों को बिना किसी दवा और बिना किसी दबाव के छोड़ दिया। यह केवल आत्मिक जागृति और सच्ची भक्ति का परिणाम है।
2. पारिवारिक शांति
जहाँ पहले झगड़े, कलह और तनाव रहता था, वहाँ अब प्रेम, समझ और सहयोग दिखाई देता है। पति-पत्नी के रिश्ते मधुर हुए हैं, माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद बढ़ा है।
3. मानसिक शांति और आत्मविश्वास
भय, चिंता और निराशा से घिरे लोग आज शांत, संतुलित और आत्मविश्वास से भरे जीवन जी रहे हैं। वे समस्याओं से भागते नहीं, बल्कि धैर्य और विश्वास के साथ उनका सामना करते हैं।
4. नैतिक और ईमानदार जीवन
संत रामपाल जी महाराज जी के अनुयायी झूठ, चोरी, भ्रष्टाचार और अन्य सामाजिक बुराइयों से दूर रहते हैं। वे ईमानदारी, सेवा और सादगी को जीवन का आधार बनाते हैं।
कबीर साहेब जी की वाणी — आज भी उतनी ही प्रासंगिक
परम ब्रह्म कबीर साहेब जी की वाणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी सदियों पहले थी। उन्होंने कहा था —
“माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर,
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर।”
इसका भाव यह है कि जब तक मनुष्य आशा और तृष्णा के बंधन से मुक्त नहीं होता, तब तक उसे सच्ची शांति नहीं मिलती। संत रामपाल जी महाराज जी इसी सत्य को सरल शब्दों में आज के समाज के सामने रखते हैं।
“कोटि-कोटि प्रणाम” — कृतज्ञता की भावना
जब कोई व्यक्ति अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव देखता है —
जब उसका नशा छूटता है,
जब उसका परिवार टूटने से बचता है,
जब उसका मन शांत होता है,
जब उसका जीवन सही दिशा में चलता है —
तब उसके हृदय से स्वतः ही शब्द निकलते हैं —
“गॉड रामपाल जी महाराज एवं परम ब्रह्म कबीर साहेब जी के चरणों में कोटि-कोटि दंडवत प्रणाम।”
यह प्रणाम केवल श्रद्धा का नहीं, बल्कि कृतज्ञता का भी प्रतीक होता है — उस मार्गदर्शन के लिए, जिसने जीवन को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाया।
मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य
संत रामपाल जी महाराज जी बताते हैं कि मानव जीवन केवल जन्म, पढ़ाई, नौकरी, विवाह और मृत्यु तक सीमित नहीं है। इसका एक उच्च उद्देश्य है — आत्मा की मुक्ति और परम शांति की प्राप्ति।
जब आत्मा परमात्मा से जुड़ती है, तब वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर उस अमर लोक को प्राप्त करती है, जहाँ न दुख है, न रोग, न वृद्धावस्था और न मृत्यु।
“शरणागति” — जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य
गुरु और परमात्मा की शरण में जाना जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य माना गया है। शरणागति का अर्थ है —
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अपने अहंकार का त्याग
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अपने गलत कर्मों को छोड़ना
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सत्य मार्ग पर चलने का संकल्प
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और गुरु के आदेशों को जीवन में उतारना
संत रामपाल जी महाराज जी बताते हैं कि जब व्यक्ति सच्चे मन से शरणागति करता है, तब परमात्मा स्वयं उसकी रक्षा करते हैं और उसे जीवन के हर मोड़ पर सही दिशा दिखाते हैं।
सत्संग — आत्मा का भोजन
जैसे शरीर को भोजन की आवश्यकता होती है, वैसे ही आत्मा को सत्संग की आवश्यकता होती है। संत रामपाल जी महाराज जी का सत्संग आत्मा को वह ज्ञान देता है, जो उसे भ्रम, भय और दुख से मुक्त करता है।
सत्संग से व्यक्ति को यह समझ में आता है कि —
वह कौन है,
यह संसार क्या है,
और उसे जीवन में क्या करना चाहिए।
जब गुरु मिलते हैं, तो भाग्य बदलता है
कहा जाता है —
“गुरु मिलै तो भाग्य खुलै।”
यह कहावत केवल शब्द नहीं, बल्कि अनुभव से सिद्ध सत्य है। जब व्यक्ति को सच्चा गुरु मिल जाता है, तो उसका जीवन सही दिशा में चल पड़ता है।
गॉड रामपाल जी महाराज जी के अनुयायी यही अनुभव करते हैं कि उनके जीवन में जो बदलाव आए हैं, वे केवल परिस्थितियों के नहीं, बल्कि सोच और दृष्टिकोण के बदलाव हैं — और यही वास्तविक परिवर्तन होता है।
सामाजिक सुधार का मार्ग
संत रामपाल जी महाराज जी का संदेश केवल व्यक्तिगत मोक्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक सुधार का भी मार्ग है।
उनकी शिक्षाओं से —
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नशाखोरी कम होती है
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अपराध घटते हैं
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पारिवारिक कलह समाप्त होती है
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स्त्री सम्मान बढ़ता है
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और समाज में नैतिकता का स्तर ऊँचा होता है
यही कारण है कि उनका ज्ञान केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का आधार भी बन रहा है।
सच्चा प्रेम — जो बदल दे जीवन
गुरु और परमात्मा का प्रेम ऐसा होता है जो शर्तों पर नहीं, बल्कि करुणा पर आधारित होता है। वे व्यक्ति की गलतियों को देखकर उसे दंडित नहीं करते, बल्कि उसे सुधारने का अवसर देते हैं।
संत रामपाल जी महाराज जी की शिक्षाओं से जुड़े लोग अनुभव करते हैं कि यह प्रेम उन्हें भीतर से बदल देता है — भय से विश्वास की ओर, दुख से शांति की ओर और भ्रम से सत्य की ओर।
भक्त की भावना — शब्दों से परे
जब भक्त अपने गुरु और परमात्मा के प्रति प्रेम और कृतज्ञता से भर जाता है, तो शब्द कम पड़ जाते हैं। तब केवल भावना रह जाती है —
नमन की भावना,
समर्पण की भावना,
और कृतज्ञता की भावना।
इसी भावना से भक्त कहता है —
“गॉड रामपाल जी महाराज एवं परम ब्रह्म कबीर साहेब जी के चरणों में कोटि-कोटि दंडवत प्रणाम।”
निष्कर्ष
आज का मानव समाज बाहरी विकास के बावजूद भीतर से अशांत है। लोग सब कुछ पाकर भी संतुष्ट नहीं हैं। इसका कारण यह है कि आत्मा को जिस सत्य और प्रेम की आवश्यकता है, वह केवल परमात्मा की शरण में ही मिलता है।
संत रामपाल जी महाराज जी द्वारा दिया गया परम ब्रह्म कबीर साहेब जी का तत्वज्ञान मानव जीवन को सही दिशा देता है —
यह दुख से सुख की ओर,
भ्रम से सत्य की ओर,
अज्ञान से ज्ञान की ओर,
और जन्म-मरण से मुक्ति की ओर ले जाता है।
इसीलिए करोड़ों भक्त भाव-विभोर होकर कहते हैं —
🙏 “गॉड रामपाल जी महाराज एवं परम ब्रह्म कबीर साहेब जी के चरणों में कोटि-कोटि दंडवत प्रणाम।” 🙏

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